
राम पाल श्रीवास्तव ‘अनथक’ (विद्वंमुक्तामणिमालिका)
संपादक – पवन बख्शी
ब्लूजे बुक्स दिल्ली
प्रथम संस्करण – 2025
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किसी मनुष्य के व्यक्तित्व की पहचान उसकी शारीरिक बनावट अथवा सामाजिक हैसियत से पूर्णतः नहीं हो सकती है क्योंकि उसके व्यक्तित्व पर उसके आंतरिक गुणों और आचरण की गहरी छाप पड़ती है जो कि उसके आध्यात्मिक और नैतिक गुणों यथा मानवीयता, ईमानदारी, नैतिकता और आत्म-संस्कार पर आधारित होता है ।
व्यक्तित्व के बारे में सर्वप्रथम सिगमंड फ्रायड ने मनोविश्लेषणात्मक सिद्धांत का प्रतिपादन किया था जिसके अनुसार किसी मनुष्य का व्यक्तित्व तीन भागों इदं, अहं और पराअहं से मिलकर बना होता है । व्यक्तित्व के विकास की अत्यंत महत्वपूर्ण प्रक्रिया इदं, अहं और पराअहं के आपसी संघर्ष, संतुलन तथा संतुष्टि होती है । जिसकी झलक उसके कार्य और व्यवहार में मिलती है अर्थात किसी व्यक्ति के व्यक्तित्व का सटीक आँकलन उसके कृतित्व से किया जा सकता है क्योंकि उसके कृतित्व पर बाह्य जगत के साथ-साथ उसके आंतरिक गुणों का प्रभाव बहुत अधिक पड़ता है ।
वरिष्ठ पत्रकार, इतिहासकार, साहित्यकार एवं मनोरोग परामर्शक पवन बख्शी जी ने विद्वानों के व्यक्तित्व व कृतित्व कई नीर-क्षीर विश्लेषणात्मक शृंखला विद्वंमुक्तामणिमालिका के 13 वें संस्करण के अंतर्गत प्रखर पत्रकार व साहित्यकार राम पाल श्रीवास्तव जी के इंद्रधनुषी रंगों को साहित्यकाश में आच्छादित करने के लिए ‘राम पाल श्रीवास्तव ‘अनथक’ (पत्रकारिता और साहित्य का अनोखा संगम)’ का संपादन किया है । पवन बख्शी जी स्वयं किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं किन्तु अन्य साहित्य नक्षत्रों को तराश कर पाठकों के सामने लाने की प्रतिबद्धता के लिए वे बधाई के पात्र हैं ।
पुस्तक में समाज व परिवार के मानदंडों के अनुरूप राम पाल श्रीवास्तव जी की विशेषताओं की पहचान की गई है । जब किसी व्यक्ति का शोधात्मक विश्लेषण होता है तो बहुत से अनछुए पहलुओं पर प्रकाश पड़ता है । ऐसे ही एक पहलू राम पाल श्रीवास्तव जी के लेखन गुरु स्व. काशीनाथ उपाध्याय भ्रमर ‘बेधड़क बनारसी’ से पाठक रूबरू होते हैं । यह पुस्तक उन्हीं लेखन गुरु को समर्पित की गई है । ‘परिचय प्रकाश’ तथा ‘स्मृतियों के झरोखे से’ के माध्यम से राम पाल श्रीवास्तव जी ने कुछ बातें – कुछ यादें पाठकों के साथ साझा की हैं कि उनका अपनी नेत्रहीन मौसी के प्रति अगाध प्रेम था । पारिवारिक खट्टी-मीठी स्मृतियाँ, कड़ा संघर्ष, और अपनी जीवन यात्रा को भी उन्होंने बयान किया है । प्रख्यात समीक्षक व कवि फगवाड़ा के दिलीप कुमार जी ने रामपाल जी के व्यक्तित्व के मानवतावादी दृष्टिकोण को परखते हुए लिखते हैं – “आप गाँव और शहर या यूँ कहें भारत और पाश्चात्य देशों अथवा पूरे संसार / भूमंडल में मनुष्य / देवत्व के दर्शन करते हैं ।” (पेज 13)
किसी व्यक्ति के द्वारा किए गए कार्यों व साहित्यिक अवदान का वास्तविक मूल्यांकन उसकी कृतियों के द्वारा ही होता है । दरअसल व्यक्ति के लेखन में उसकी चर-अचर के प्रति सोच, उसका समाज, प्रकृति, जीव-जंतुओं तथा मानव के प्रति दृष्टिकोण, उसके चेतन-अचेतन की कल्पना शक्ति, चीजों को देखने का नजरिया, उसके चिंतन की दिशा, उसकी संवेदनाएँ एवं उसका विजन उभर कर आता है । इसीलिए उसकी कृतियों को जानना यानी उसको जानना होता है । ‘विद्वंमुक्तामणिमालिका’ में भी इसी सिद्धांत का अनुपालन करते हुए राम पाल जी की कुछ चर्चित कृतियों की समीक्षाओं के माध्यम से उनके व्यक्तित्व को परखा गया है । काव्य संग्रह ‘शब्द-शब्द’ की कविताओं में निहित गूढ़ार्थों के द्वारा रामपाल जी के चिंतन के व्यापक फलक को समीक्षकों दिलीप कुमार, नैय्यर उमर अंसारी तथा डॉ चंद्रेश्वर ने प्रस्तुत किया है – “उनकी कई कविताएँ शब्द को लेकर ही लिखी गई हैं, जिनमें जीवन और समय-समाज से गूढ़ दार्शनिक निष्पत्तियों को भी देखा-परख जा सकता है ।” (डॉ चंद्रेश्वर जी, पेज 42)
इसी तरह अतुल्य खरे, पवन बख्शी काव्य कृति ‘अँधेरे के खिलाफ’ की समीक्षात्मक टिप्पणियों में राम पाल जी के शब्द-शब्द, वाक्य-वाक्य को पीड़ा, युद्ध, हिंसा, आतंक, अत्याचार आदि के तमाम अँधेरों के खिलाफ मानते हैं – “शीर्षक कविता ‘अँधेरे के खिलाफ’ कवि की प्रभु से भाँति-भाँति के अँधेरों के खिलाफ खड़े होने, जूझने एवं लड़ने की शक्ति प्रदान करने की प्रार्थना है ।” (अतुल्य खरे, पेज 52)
किसी व्यक्ति का स्वयं का लेखन उसकी संपूर्ण पहचान का एक अभिन्न अंग हो सकता है । किन्तु अन्य के विचारों के प्रति उसके नजरिए से ही उसका समग्र मूल्यांकन संभव होता है । राम पाल जी ने इसका निर्वहन अपनी समीक्षक की भूमिका के माध्यम किया है । समीक्षा पुस्तक ‘जिट देखूँ तित लाल’ आलेख संग्रह ‘बचे हुए पाठ’ भारतीय मुसलमानों की आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक समस्याओं पर आधारित आलेख संग्रह ‘सत्ता के गलियारे में सफेद हाथी’ तथा शोध एक नई दृष्टि ‘अवतारवाद’ उनकी सामाजिक समरसता, जातीय व धार्मिक भाईचारा एवं आध्यात्मिक चिंतन के विभिन्न आयामों को परिदृश्य में लाती हैं । इन पुस्तकों में राम पाल जी के जीवनानुभावों, मूल्यों और विश्वास पर प्रकाश पड़ता है ।
जब व्यक्ति का जुड़ाव अपनी जड़ों से होता है तो उसके विश्वास और मूल्य मज़बूत होते हैं । गाँव, शहर, देश और अपने आस-पास के मानदंड, परंपराएँ उसके व्यक्तित्व की विशिष्टता बन जाते हैं । ऐसे में इनके पतन से व्यक्ति बहुत क्षुधित होता है । समाज में बढ़ती हुई वैमनस्यता, लालच तथा प्राकृतिक संसाधनों के निर्मम दोहन से उत्पन्न पीड़ा व्यक्ति के लिए असहनीय होती है । अपने गाँव मैनडीह बलरामपुर की व्यथा-कथा की पीड़ा की उत्पत्ति है राम पाल जी का उपन्यास ‘त्राहिमाम युगे युगे ।’ जिसके माध्यम से भी पाठक राम पाल जी के अंदर उठ रहे आक्रोश एवं क्षोभ को झाँकने में सफल होते हैं ।
दुनिया के प्रति किसी व्यक्ति की धारणा स्वयं के अनुभवों से तो बनती ही है उसको समाज में प्रचलित धार्मिक मान्यताएँ और परिवेश भी आकार देते हैं । रामपाल जी के इसी व्यापक दृष्टिकोण को पाठक उनके द्वारा संपादित एवं अनुवादित कहानी संग्रह ‘कहानियों का कारवाँ’ भली-भाँति समझ सकते हैं । राम पाल जी धार्मिक, राजनैतिक, सामाजिक एवं भाषायी क्षुद्रताओं से ऊपर उठकर मुसलमानों एवं उर्दू के प्रति सम्मानित भाव रखते हैं । इसके साथ ही वे भ्रष्टाचारियों को फांसी पर चढ़ाने की पुरजोर वकालत करते हैं । आज के समय में मुसलमानों एवं भ्रष्टाचार की बात कर राम पाल जी ने बहुत हिम्मत का काम किया है और एक सच्चे पत्रकार होने का दायित्व निभाया है ।
राम पाल जी ने पराड़कर जी पर लघु शोध तथा विष्णु प्रभाकर जी का साक्षात्कार लेकर जीवन की राह को बदलने में शिक्षकों के महत्व को बल दिया है ।
पुस्तक का संपादन या तो बहुत शीघ्रता में किया गया है या फिर बख्शी जी की व्यस्तता व उम्र का प्रभाव पुस्तक में परिलक्षित हो रहा है । कहानियों का कारवाँ की समीक्षा में जालंधर निवासी डॉ अजय शर्मा लिखते हैं के अन्तर्गत अवतारवाद की समीक्षा दी गई है । 29 संपादकाचार्य बाबूराव विष्णु पराड़कर के अंतर्गत कोई आलेख, समीक्षा आदि नहीं दी गई है । कई समीक्षाओं में पूरी-पूरी कविताएँ शामिल होने से समीक्षाएँ औपचारिकता जैसी बन कर रह गई हैं । पुस्तक पर मूल्य अंकित न होने से पाठकों व शोधार्थियों को क्रय करने में मुश्किल होगी । पुस्तक को वृहदाकार रूप देने के लिए कविताओं की जगह अन्य शुभचिंतकों के लेख, आलेख होने से पाठक राम पाल जी की व्यापकता से और अधिक अवगत हो सकते थे ।
समग्र रूप से ‘राम पाल श्रीवास्तव ‘अनथक’ (पत्रकारिता और साहित्य का अनोखा संगम)’ पुस्तक राम पाल जी की अंतर्दृष्टि के साथ-साथ बाह्यदृष्टि से पाठकों को परिचित कराने में सफल रही है ।
मधुर कुलश्रेष्ठ
आदर्श कॉलोनी गुना
9329236094







