“त्राहिमाम युगे-युगे” एक पुकार है उस अत्याचार, शोषण, भ्रष्टाचार से बचाने का जो युगों-युगों से इस धरती पर अपनी जड़ें मजबूती से जमाए हुए हैं। ‘त्राहिमाम युगे-युगे’ उन परम्पराओं के गुम हो जाने की कथा है जिन्हें कभी दबे-कुचले लोग ज़िन्दा रखे हुए थे। यह उपन्यास उन गुमशुदा गांव और नहरों की है, उन व्यक्तियों और परम्पराओं की है जिन्हें सरकारी उपेक्षाओं और माफियाओं की लालच ने निगल लिया है।  
            इस उपन्यास की शुरुआत तीन पात्रों– माधवकांत सिन्हा, नवीन कुमार और अब्दुल्लाह की हवाई सफ़र से होती है जो एक प्रोजेक्ट के तहत संयुक्त रूप से लिखी गई पुस्तक –त्राहिमाम युगे-युगे पर मिले योकर पुरस्कार लेने न्यूयॉर्क जा रहे होते हैं। इस उपन्यास में 16 अध्याय हैं। प्रत्येक अध्याय की अपनी एक कहानी है जो त्रयी पात्रों (लेखकों) ने प्रोजेक्ट पर काम करते हुए अलग-अलग अनुभवों को लिपिबद्ध किया है।
              राम पाल श्रीवास्तव के इस उपन्यास की शैली यानी अंदाज़ेबया लाजवाब है और त्राहिमाम युगे-युगे’ को पढ़ने के लिए बाध्य करता है। हम इसे एक आंचलिक उपन्यास कह सकते हैं क्योंकि इस उपन्यास का अधिकतर अध्याय गंव‌ई पृष्ठभूमि पर लिखे गए हैं। उपन्यासकार राम पाल श्रीवास्तव ने लिखा भी है – मैंने ग्रामीण जीवन के परिवेश को जैसा अनुभव किया है, उसी को इस उपन्यास में समाहित करने की कोशिश और काविश की है। मैं यह कह सकता हूं कि आम आदमी की पीड़ा, विवशता, संत्रास जैसी स्थितियों के साथ ही उसकी आकांक्षाओं, आस्थाओं, उम्मीदों के प्रवाह में झूठ, छल प्रपंच, ग़लत राहरवी, ऐय्यारी, मक्कारी आदि रुझानों एवं प्रवृत्तियों को जैसा मैंने देखा, सुना और महसूस किया है, उसको मैंने अपने इस प्रथम प्रकाशित उपन्यास में अपनी पूरी संचेतना और प्रतिबद्धता के साथ पेश करने का प्रयास किया है।
              लेखक ने जहां एक ओर हिन्दू -मुस्लिम सद्भावना को रेखांकित किया है वहीं मौजूदा समय में धार्मिक स्तर पर देश में बढ़ते विद्वेष को भी उजागर किया है जिसमें शासन-प्रशासन का रवैया सोचनीय है। साफ शब्दों में कहूं तो ‘त्राहिमाम युगे-युगे’ छीजते रिश्तों और लुप्त हुए संसाधनों की महागाथा है। सरकारी योजनाओं के विफल होने और भ्रष्टाचारी अधिकारियों-मातहतों की अनियमितताओं का काला चिट्ठा है।
                राम पाल श्रीवास्तव अपनी रचना प्रक्रिया में लिखते हैं – मैं ज़्यादा साफगोई से यह कह सकता हूं कि इसमें न तो पर्सी लब्बाॅक का ‘फाॅर्म’ है, न ही एडविन म्योर का ‘स्ट्रक्चर’। हेनरी जेम्स का ‘पैटर्न’ भी इसमें नहीं दिखता, किन्तु उसके जैसी कुछ सोद्देश्यता अवश्य झलकती है। मार्शल प्रूस्त का ‘रिदम’ तो इसमें है ही नहीं। कथानक ज़रूर नवरूपता रखता है जो घटना प्रधान और चरित्र प्रधान दोनों है। इसके बावजूद मेरा यह दावा नहीं और न ही इसमें सच्चाई है कि प्रस्तुत उपन्यास कोई सत्यकथा है।
               इस उपन्यास में लेखक ने गांव के सम्पूर्ण संरचना के एक-एक उतार-चढ़ाव तथा उसकी विसंगतियों-विद्रुपताओं को बखूबी उजागर किया है। उपन्यास में उन परम्पराओं पर भी कलम चलाया गया है जो गांव में तो नहीं पर न‌ई पीढ़ी, ख़ासकर शहरी परिवेश में लुप्तप्राय – सा हो गया है। बच्चों का बचपन में किन्हीं अज्ञात कारणों से होने वाली मौतों से बचाने के लिए दूसरे के हाथों बेचने की परम्परा का साइंटिफिक तौर पर भले कोई महत्व न हो पर मान्यताओं का यह भी एक तरीका है जो पहले के समय में काफी प्रचलित था। इस परम्परा के दुष्परिणाम भी है। बच्चे अपने वास्तविक माता-पिता यानी जन्मदाता को भूल जाते हैं और पालने वाले मां-बाप से जुड़े रह जाते हैं।
                 इस उपन्यास की यह खासियत है कि पाठक हर अध्याय में एक नई कहानी से रूबरू होता है त्रयी लेखकों के ज़रिए। इसीलिए उपन्यास कदम-दर-कदम पठनीय होता जाता है। राम पाल श्रीवास्तव जी का यह प्रयोग बेहद सफल रहा है।
                ‘ त्राहिमाम युगे-युगे’ न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन, न‌ई दिल्ली से प्रकाशित एक शानदार पुस्तक है।
  — अख़लाक़ अहमद ज़‌ई
मुंबई

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