आज के दौर की प्रशंसात्मक समीक्षाओं भरे साहित्यकाश में रचनाओं के ताने-बाने की कसौटी पर कसती हुई समीक्षा, समालोचना या आलोचना करना समीक्षक या आलोचक के लिए ‘अपने पैरों पर कुल्हाड़ी’ मारने जैसा है क्योंकि आज लेखक स्वयं की आत्म-मुग्धता एवं आत्मालाप में ही खोया हुआ है, ऐसे में वह अपनी रचना की सर्वश्रेष्ठता पर खड़े किए जाने वाले प्रश्नचिह्नों से कुपित होता है । ऐसे गिरावट के दौर में अपने पैर की चिंता न करते हुए, इस सिकुड़ते समीक्षा वितान को, ‘ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर’ भाव अपनाते हुए, सुविख्यात पत्रकार एवं साहित्यकार रामपाल श्रीवास्तव जी ने रचनाओं की नीर-क्षीर करती अपनी समीक्षाओं में फिर से फैलाव दिया है । ये समीक्षाएं समय-समय पर पत्रकाओं व समाचार पत्रों में प्रकाशित हुई हैं और खुले दिल से सराही गई हैं । इन्हीं समीक्षाओं को उन्होंने अपनी सद्य प्रकाशित समीक्षा पुस्तक ‘नई समीक्षा के सोपान’ में संग्रहीत किया है ।
दौर कोई सा भी हो प्रशंसक और आलोचक हमेशा से रहे हैं । समय के साथ उनकी संख्या में बदलाव होता रहता है । दोनों ही अपने-अपने ढंग से काम करते रहते हैं । जैसा कि रामपाल जी ने अपने पुरोवाक में उद्धृत किया है कि यह क्षरण 1945 से होना शुरू हो गया था तथा अमृत राय ने ‘नई समीक्षा’ ग्रंथ की रचना कर एक तरह से मान्यता प्रदान कर दी थी, लेकिन उस वक्त भी आचार्य रामचंद्र शुक्ल की आलोचना परंपरा का निर्वाह हो रहा था और आज भी रामपाल जी जैसे समीक्षक, आलोचक उस परंपरा का निर्वाह कर रहे हैं ।
यह सर्वविदित है कि किसी कृति या रचना की समीक्षा या आलोचना करना कृति की रचना करने से ज्यादा मुश्किल और श्रमसाध्य काम होता है फिर भी रामपाल जी यह कार्य कर रहे हैं क्योंकि लेखक की भी उत्कंठा होती है कि कोई उसकी रचना के गुण-दोषों को परखे । उसकी रचना को साहित्य के स्थापित मानकों अनुसार दृष्टिपात करके लेखक तथा पाठकों के समक्ष लाया जाए । रामपाल जी ने अपने गहन अध्ययन, पत्रकार की खोजी दृष्टि से जनवरी 1908 के सरस्वती अंक की समीक्षा कर इस क्षेत्र में अपनी धाक जमाना शुरू कर दिया था । वह समीक्षा भी इस पुस्तक में ‘सरस्वती विमर्श’ के नाम से शामिल है तथा उन्होंने बड़ी ही बेबाकी से पत्रिका के महत्वपूर्ण एवं कमजोर बिंदुओं को पाठकों के समक्ष रखा है ।
रामपाल जी की पौराणिक ग्रंथों के अध्ययन की गहराई समीक्षा ‘नाग संस्कृति संसार के आश्चर्यों में’ प्रतिबिंबित होती है । एक स्थान पर वे लेखक द्वय की प्रशंसा करते हुए लिखते हैं- “लेखक द्वय की यह बात बिल्कुल सच है कि सनातन धर्म एक शाश्वत एवं सत्यपरायण धर्म है ।” वहीं वे भागवत पुराण, बाराह पुराण, मत्स्य पुराण के पौराणिक संदर्भों के विस्तृत उद्धरण देकर पुस्तक की कमी को भी इंगित करते हैं- “पौराणिक संदर्भों में नागराज वासुकि का विशद विवेचन बड़ा मामूलाती है ।”
यद्यपि कोई भी लेखक रचना लिखने से पहले विषय की प्रामाणिकता हेतु शोध, तथ्य संग्रहण तथा चिंतन-मनन करता है और समीक्षक उस कृति या रचना में दी गई तथ्यात्मकता को परखने की यथासंभव कोशिश करता है । यह जिम्मेदारी तब और बढ़ जाती है जब समीक्षित पुस्तक किसी ऐतिहासिक, पौराणिक या धार्मिक विषय पर हो । ‘हनुमान चालीसा’ के रचयिता विषय पर पवन बख्शी की पुस्तक ‘स्मृतियों के झरोखों में तुलसीपुर’ की समीक्षा में रामपाल जी ने अनुसंधान परक तथ्यों के साथ अपनी जिम्मेदारी का कुशलता पूर्वक निर्वहन किया है – “यह बात दीगर है कि संत तुकराम का नाम तुलसीदास भी होने और उनके द्वारा ‘हनुमान चालीसा’ रचे जाने का कोई भी प्रमाण नहीं दिया गया है।… फिर भी उनका शोध अति सराहनीय है । धर्मायण जुलाई-दिसंबर 2016 पटना में छपे भवनाथ झा के शोध लेख में ‘हनुमान चालीसा’ 1850-60 की रचना बताई गई है, से पवन बख्शी की बात को बल मिलता है ।”
रामपाल जी गद्य और पद्य विधाओं के परम ज्ञाता हैं । उनकी गद्य रचनाएं जितनी जमीनी एवं यथार्थ से जुड़ी हुई होती हैं उतनी ही काव्य रचनाएं आम मानव के प्रति संवेदनशीलता लिए हुए होती हैं । समीक्षा में भी वे अपनी तीक्ष्ण मेधा से रचना के मर्म तक पहुँचते हैं । जो विद्वत विश्लेषण गद्य पुस्तकों ‘आखिरी शहतीर,’ ‘शिगूफ़ा,’ ‘तृप्ति की बूंद,’ ‘छलिया,’ ‘तमाशाई,’ ‘शंख में समंदर’ आदि की समीक्षाओं में मिलता है वही गहनता काव्य पुस्तकों ‘उम्मीद की लौ,’ ‘एक मुश्किल समय में,’ ‘रक्तबीज है आदमी,’ ‘प्रकृति के प्रेम पत्र’ आदि में मिलती है ।
रामपाल जी हिन्दी के साथ-साथ उर्दू भाषा में भी पारंगत हैं । दोनों भाषाओं के व्याकरण पर उनका समान अधिकार है । जो उनकी रचनाओं में तो प्रदर्शित होता है तथा समीक्षित पुस्तक की समीक्षाओं में भी उनकी यही हिन्दी, उर्दू सिद्धहस्तता दिखती है । ‘उम्मीद की लौ’ पुस्तक की समीक्षा में उनकी भाषायी पकड़ तथा निर्मम चीर-फाड़ की बानगी से रूबरू हुआ जा सकता है – “शीर्षक में भविष्य की आशा का सुखद संचार है, जो लौ बनकर मार्ग-बाधाओं का शमन करती है । ‘उम्मीद की लौ’ मनोवृत्ति का मनोरम शाहकार है । आवरण भी इसी की अक्कासी करता है ।” तथा “यह पुस्तक बिंब-प्रतिबिंब पब्लिकेशन्स फगवाड़ा (पंजाब) से छपी है । इसमें प्रूफ शोधन में हड़बड़ी और गड़बड़ी दोनों की आमेज़िश है ।”
समीक्षा में समदृष्टि का अनुपालन करते हुए पुस्तक ‘छलिया’ की कहानियों की सहज शैली को पाठकों हेतु दिलचस्प तो बताते ही हैं – “शैली काफी दिलचस्प है, जो पढ़ने में इतनी रवानी और तल्लीनता पैदा कर देती है कि एक ही सिटिंग में अंत तक पढ़ना ही पढ़ता है।” वहीं खामियों की भी चर्चा करते हैं – “प्रूफ की त्रुटियाँ अधिक होने से किसी भी पाठक का पढ़ने में मजा किरकिरा हो जाता है । … भाषा-शैली और परिमार्जित होती, तो और बेहतर था ।” कृतियों की त्रुटियों को इंगित करते हुए समीक्षित पुस्तक भरसक त्रुटि रहित मुद्रित करायी गई है किन्तु ‘छलिया’ कहानी संग्रह की समीक्षा में संभवतः छलिया के स्थान पर छठिया रह गया है – “छठिया की पहली कहानी छठिया का कहना ही क्या !”
पुस्तक में कुल 31 कृतियों की समीक्षा में कहानी, उपन्यास, लघुकथा, कविता तथा पत्रिकाओं को शामिल कर साहित्यिक विधाओं के विभिन्न रंग समेटे गए हैं ।
जहाँ कृति की समीक्षा से एक मात्र उसका लेखक ही लाभान्वित होता है वहीं किसी  पत्रिका की समीक्षा से अनेक रचनाकारों को अपनी-अपनी रचनाओं की विवेचना मिल जाती है । 3 पत्रिकाओं की समीक्षा पुस्तक में शामिल कर अनेक रचनाकारों को उनकी रचनाओं के गांभीर्य विश्लेषण से अवगत कराने के लिए भी रामपाल जी बधाई के पात्र हैं ।
पुस्तक का फॉन्ट अन्य पुस्तकों की अपेक्षा बड़ा होने से सुलभता से पठनीय है । मुद्रण, साज-सज्जा तथा आवरण सुंदर है ।
पुस्तक पाठकों तथा शोधार्थियों के लिए उपयोगी होगी ऐसी मेरी आशा है |
– मधुर कुलश्रेष्ठ
[ लेखक/ उपन्यासकार, सतना, मध्य प्रदेश ]

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