
यह उपन्यास एक नए प्रयोग के कारण अन्य भारतीय उपन्यासों से अलग है। उपन्यास में शीर्षक देना तथा छोटी-छोटी घटनाओं को जोड़ते हुए अध्यायों का शक्ल देते हुए समुचित आकार ग्रहण करना इस उपन्यास की विशेषता है।
ऐसा प्रयोग प्रायः पाश्चात्य साहित्य में देखा जाता है। लेकिन सच यह भी है कि परंपरागत भारतीय उपन्यास सा रस यहाँ नहीं मिलता। इसकी क्रमबद्धता टूटती-सी दिखती है। गहन मनोवैज्ञानिकता व वैचारिक संवेदनाओं का अभाव दिखता है।
यद्यपि इसमें समय-समाज की कई ज्वलंत विसंगतियों पर ध्यान आकर्षित कराया गया है, जो यथार्थ तो है लेकिन रोचकता का अभाव भी है। उर्दू, फारसी,अरबी शब्दों के अत्यधिक प्रयोग से भी इसमें दुरूहता व जटिलता आ गयी है, जिससे रस-प्रवाह बाधित है।
वैसे यह प्रयोग स्वागतेय है। नये प्रयोग से गुजरते हुए पाठकों को रोमांच का अनुभव होगा। लीक से हट कर लेखक ने जोखिम उठाया है, जो पाठकों को नए स्वाद से अवगत कराएगा, ऐसा मेरा विश्वास है। मुझे विश्वास है, इसे पाठकों/आलोचकों का स्नेह मिल सकेगा। जयंति ते सुकृतनः।
# मांगन मिश्र “मार्त्तण्ड”
प्रधान संपादक ” संवदिया “
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त्राहिमाम युगे-युगे : एक प्रयोगात्मक उपन्यास
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