कवि और लेखक अपने मन की बात नहीं कहता वह जन मन की बात कहता है। जिसे आमजन कहना तो चाहता है पर शब्दों या परिस्थितियों के अभाव में नहीं कह पाता लेकिन वही आदमी जब साहित्य की किसी धारा से जुड़ता है और उसे लगता है कि अरे यहां तो मेरे ही मन बात हो रही है, तो फिर वह उसके साथ बंधता चला जाता है। वेदों की ऋचाएं हजारों साल ऐसे ही जिंदा रहीं, जब कागज का आविष्कार भी नहीं हुआ था।
आजकल खूब लिखा जा रहा है। साहित्य की हर विधा में लिखने वालों की संख्या मांग से हजारों गुना ज्यादा है। इसलिए ढेरों ढेर लुगदियों के बीच उस चमकते पन्ने को ढूढना काफी मुश्किल हो गया है जहां अपने मन की बात लिखी हो। इसी का दुष्परिणाम यह हुआ कि पाठक लेखक से दूर होता गया। देर से ही सही लेकिन अच्छी कृतियां अपना पाठक ढूंढ ही लेती हैं।
अतुलनीय साहित्य प्रेमी श्री लक्ष्मी नारायण अवस्थी जी मेरे और रामपाल श्रीवास्तव ‘अनथक’ जी के बीच पहचान का माध्यम बने जब उन्होंने मेरी लघु व्यंग्य उपन्यासिका तमाशाई को अनथक जी के पास पहुंचाया। बलरामपुर जो कि मेरे छात्र जीवन का कर्मभूमि रहा है अनथक जी वहीं के निवासी हैं। दुर्भाग्य कई रूपों में हमारे सामने आता है और मेरा ये कि मैं अब तक अनथक जी को नहीं जानता था।
इसीलिए मैने इस लेख का शीर्षक दिया है ‘कस्तूरी कुंडल बसे’ क्योंकि जो मैं दंडकवन में भटकते हुए और पूर्वोत्तर की पहाड़ियां चढ़ते हुए खोज रहा था वह मेरे कितना करीब था इसका मुझे अंदाजा ही नहीं था।
रामपाल श्रीवास्तव ‘अनथक’ जी का यह कविता संग्रह ‘अंधेरे के खिलाफ’ कुल 62 अतुकान्त कविताओं से सुसज्जित 128 पृष्ठीय काव्य संकलन है, जिसे एक बैठकी में आराम से पढ़ा जा सकता है।
मैं जाऊंगी ऐसे नहीं
मैं तो भूखी हूं
मैं तेरी मौत हूं।
रवि जिंदगी से निराश है और वह टीले पर चढ़कर संगम में छलांग लगा देता है। मौत स्वयं मोटरबोट लेकर आती है और उसे बचा लेती है। लेकिन वही मौत एक दिन स्वयं उसे लेने आती है तब कवि मौत की याद में कविता लिखता है – ‘मौत की याद ‘ ।
सुन शब्द
जब इंसानियत ठिठुरेगी
तुम ख़ाब जगाना
जीने के नेकी के
जीवन -रहस्य को समझाना
मुझे साक्षात सूर्य बनाना
ताकि मैं जूझ सकूं
जटिलताओं से
‘ तमसो मा ज्योतिर्गमय ‘ की भावना ही कविता का प्राणतत्व है। इसके बिना काव्यरूप की कल्पना करना सीप के बिना मोती की संकल्पना के समान है।
आत्म चैतन्य को प्रबुद्ध बनाने की औषधि
असंभव को संभव करने का मंत्र
शांति और प्रेम का तंत्र
जीवन की महौषधि
आनंद की समाधि …
जीवन का मूल उद्देश्य आनंद की प्राप्ति है। परेशान कोई नहीं रहना चाहता लेकिन जिंदगी की सबसे बड़ी विसंगति यही है कि हम आनंद की खोज में ही सबसे ज्यादा परेशान भी रहते हैं। ऋषियों और मुनियों ने ब्रह्मानंद की प्राप्ति को जीवन के मूल उद्देश्य से जोड़ा है। इस ब्रह्मानंद तक पहुंचने के कई रास्ते हैं । कविताई भी उसी में से एक है। अभी कुछ दिन पूर्व ही एक संपादकीय में पढ़ा कि इंग्लैंड में वैज्ञानिक खोज हुई है जिसमें कहा गया है कि कविता पढ़ने वाले और लिखने वालों मानसिक रोग होने की संभावना कई गुना कम हो जाती है।
मगर हिंदी ?
अपने वजूद पर रोती है
शिनाख्त का बहाना ढूंढती है
नहीं मुखरित हो पाती
सकुचाती है
हीन भावना से
दिलों में दबी रहती है
दिल में ही घुटती है
फिर कोई नहीं बोल पाता हिंदी
दिवस तक याद नहीं रहता
जलप्रवाह अवरुद्ध हो जाता है टेम्स का
वेस्ट मिनिस्टर गवाह जो ठहरा
ढपोर शंखों का!!
कवि के चिंतन का विषय विस्तृत है। यहां कभी ऐतिहासिक पात्र ‘राम जन्म भूमि के मौलवी’ कविता का विषय बने हैं, जिन्होंने अंग्रेजों से लोहा लिया था और पुवाएइन गांव के राजा जगन्नाथ के द्वारा धोखे से मार दिया गया था। तो कभी कंगाल चरवाहे ने कविता की पृष्ठ भूमि पर कब्जा जमा लिया है जो बकरियां चराता है।
वादा ही मेरा पैरहन है
वादा ही मेरा भोजन है
वादा ही मेरा वासन है
वादा ही मेरा जीवन है
ही नेता तुझे नमन है !
……
पुस्तक – अंधेरे के ख़िलाफ़
लेखक – रामपाल श्रीवास्तव ‘अनथक’
विधा — कविता संग्रह
प्रकाशन – समदर्शी प्रकाशन
मूल्य – ₹200
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समीक्षक – चित्रगुप्त 
[ वरीय साहित्यकार ]

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