भारत के प्राचीन काल से ही अन्य देशों से संपर्क रहे हैं। ऐतिहासिक तौर पर , बौद्ध भिक्षु और व्यापारी समुद्रों, रेगिस्तानों और पर्वतों को पारकर आते – जाते रहे हैं। लेकिन रोमांचकारी यात्राओं के विवरण बहुत कम उपलब्ध होते हैं। हमारे देश में रूस से जो पहला पर्यटक भारत आया उसका नाम अफनासी निकीतीन था।उसका जन्म रूस के कलीनीन ( त्वेर ) में हुआ था। वह 1466 से 1475 ई. के बीच लगभग तीन वर्ष भारत में रहा। इस यात्रा में उसे छह साल लग गए। वह इस यात्रा वृतान्त को डायरी में कलमबंद करता गया, जो पुस्तिका के रूप में रसियन में छपा और फिर अंग्रेज़ी में। अंग्रेजी से हिंदी में नेशनल बुक ट्रस्ट ने प्रकाशित किया है।अनुवादक हैं पंकज चतुर्वेदी। एन बी टी ने इसका पहला संस्करण 2008 में प्रकाशित किया था ” अफनासी निकीतीन की भारत यात्रा ” शीर्षक से। मुझे इसका चौथा संस्करण ( 2021 ) पढ़ने का अवसर मिला।
 चूंकि वह कोई लेखक नहीं था, इसलिए उसने एक आम आदमी और व्यापारी की तरह जो देखता गया , लिखता गया। उसकी यात्रा विशेषकर दक्षिण भारत के कुछ स्थानों तक ही सीमित रही, जहां के उसने संस्कृति, रहन सहन, राजकाज, सामाजिक व्यवस्था आदि को बहुत निकट्से देखा। कुछ बातें उसने लिखीं, जो अटपटी और आपत्तिजनक हैं, जैसे स्त्री – पुरुषों को लगभग नग्न रहते बताया है। वह लिखता है –
” यही भारत देश है। यहां के लोग लगभग नंगे रहते हैं। महिलाएं सिर और वक्ष को ढकती नहीं हैं। वे बालों की चोटी बंधती हैं। यहां की औरतें छोटी उम्र में ही मां बन जाती हैं और हर साल बच्चा जनती हैं। उनके ढेर सारे बच्चे होते हैं । यहां के लोग बेहद काले हैं। मैं जहां कहीं भी गया , लोगों के झुंड मुझे घेर लेते।उन्हें मेरा  गोरा रंग देखकर आश्चर्य होता है।” (पृष्ठ 5 ) …
पुस्तिका में आला बैराम नामक बड़े मुस्लिम त्योहार का ज़िक्र है, जो समझ में नहीं आता कि क्या है। संभव है कोई आंचलिक , परंपरागत चीज़ हो, जैसे मुहर्रम के ताज़िए।
ये हट्टे कट्टे लोग कमर से ऊपर कोई कपड़े नहीं पहनते हैं, नंगे पांव रहते हैं और बेहद बहादुर होते हैं। महिलाएं सिर पर कपड़ा नहीं डालती हैं और उनके वक्ष खुले रहते हैं। सात साल तक के बच्चे नितांत नंगे ही घूमते हैं। ( पृष्ठ 5,6 )
15 वीं सदी में पहला रूसी अफनासी निकीतीन भारत आया। वह वास्को डि गामा से 25 साल पहले भारत की धरती पर कदम रखने वाला पहला यूरोपीय था।
जब वह  भारत में अपनी यात्रा के आरंभ में बंबई ( मुंबई ) के पूर्व स्थित जुन्नार शहर पहुंचा, तो वहां के हाकिम असद ख़ान ने उसे पकड़वा लिया और उसका घोड़ा अपने कब्जे में ले लिया। अफनासी निकीतीन के शब्दों में आगे का घटनाक्रम इस प्रकार है –
” जुन्नार में खान ने मेरा घोड़ा छुड़ा लिया। उसे जब मालूम हुआ कि मैं रूसी हूं, लेकिन मुसलमान नहीं, तो उसने कहा , ” मैं तुम्हारा घोड़ा वापस कर दूंगा। साथ में एक हज़ार अशर्फी भी दूंगा। तुम्हें इस्लाम धर्म स्वीकार करना होगा। यदि तुम मेरी बात नहीं नहीं मानोगे, तो मैं तुम्हारा घोड़ा तो रख ही लूंगा, साथ ही तुम्हें एक हज़ार अशर्फी में नीलाम कर दूंगा।” उसने मुझे चार दिन की मुहलत दी। उन दिनों वहां का चार दिवसीय पवित्र पर्व चल रहा था। प्रभु ने मुझ पर दया की और मेरा धर्म भ्रष्ट होने से बचा लिया। हुआ यूं कि खुरासान का ख्वाजा मुहम्मद उन दिनों शहर आया हुआ था। मैंने उनसे सहायता के लिए अनुनय विनय किया। ख्वाजा ने असद खान को समझाया कि इस तरह ज़ोर जबरदस्ती से धर्म परिवर्तन करवाना इस्लाम के खिलाफ़ है। ख्वाजा मेरा घोड़ा लेकर लौटा। इस तरह प्रभु ने महान दिन पर मेरी रक्षा की।
तो मेरे रूस के मसीही भाईयो, यदि आप हिंदुस्तान जाना चाहते हों तो अपना धर्म रूस में ही छोड़कर जाना।”
इसके बावजूद खानों में से मलिक खान इस्लाम कबुलवाने के लिए उसके पीछे पड़ा रहा। निकीतीन अपने संस्मरण या यूं कहें डायरी में लिखता है, ” मलिक खान लंबे समय से मुझ पर इस्लाम स्वीकार करने के लिए दबाव डाल रहा है। मैंने उससे कहा , ” श्रीमान , तुम अपने अल्लाह को याद करते हो, मैं अपनी प्रार्थना करता हूं। तुम दिन में पांच बार नमाज़ पढ़ते हो, मैं तीन बार प्रभु को याद करता हूं। मैं एक परदेसी हूं।” मलिक खान ने मुझसे कहा, ” भले ही तुम मुसलमान नहीं बनना चाहते हो, लेकिन तुम ईसाई धर्म के बारे में भी जानकारी नहीं रखते हो।” निकीतीन हिंदुस्तान से वापसी के बारे में यह भी लिखता है, ” यदि मैं मक्का होते हुए जाने की सोचता तो मुझे इस्लाम अपनाना पड़ता। कोई भी ईसाई मक्का नहीं जाता है, क्योंकि वहां उसे अपना धर्म गंवाना पड़ता है।”
( अफनासी निकीतीन की भारत यात्रा, एन बी टी प्रकाशन,पृष्ठ 8,9,20 और 21)
जबरन धर्म परिवर्तन की कोशिश के घटनाक्रम के बाद रूसी पर्यटक अफनासी निकीतीन ने सुरक्षा कारणों से भारत में अपना नाम ख्वाजा यूसुफ खुरासानी रख लिया था, लेकिन धर्म पूछने पर अपने को ईसाई ही बताता था। उसने यह भी लिखा है कि ” मैं यहां ( भारत में ) मुसलमानों के साथ रोजे रखता और जब वे इफ्तार करते , तब मैं भी उपवास तोड़ता। ( उपर्युक्त, पृष्ठ 25 )
इस प्रकार भारत की छवि को लगातार ख़राब किया गया। 28 पृष्ठीय इस पुस्तिका में कई रेखाचित्र हैं, जो इसे कुछ बचकाना बनाते हैं। लेकिन यह बच्चों के लिए ही होती , तो अच्छा होता। सिर्फ़ इसके फॉन्ट को थोड़ा बड़ा कर दिया जाता। अनुवाद की भाषा ठीक लगती है, जिसे सजीवता के निकट ढाला गया है। निकीतीन के लेखन के पुनरुक्ति दोष को ठीक करना अनुवादक का कार्य नहीं है। मुखपृष्ठ,लेआउट, छपाई सभी उत्तम है। प्रूफ की गलतियां न के बराबर हैं। मूल्य 35 रुपए पुस्तक के आकार – प्रकार के लिहाज़ से एकदम सही है।
– Dr RPSrivastava, Editor-in-Chief, www.bharatiyasanvad.com

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