साहित्य
तुम सच बोलो
बादल गरजें या फिर बरसें आशाएं न छोड़ो मौसम कैसा भी हो तुम सच बोलो | चहुँदिश आंगन में हवा चले कितनी सर्दीली घात करे प्रतिघात से चाल कितनी कंटीली संयम की बातें सुनकर हुई कितनी भड़कीली जल के अजस्र स्रोत बहें राह कितनी पथरीली तुम भी जागो , हम Read more…